जून में परमा और निर्जला एकादशी का विशेष संयोग, जानें व्रत की तिथि, पूजा-विधि और धार्मिक महत्व
सनातन धर्म में एकादशी व्रत को भगवान विष्णु की आराधना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। जून माह में पड़ने वाली परमा एकादशी और निर्जला एकादशी का विशेष महत्व है। इन व्रतों को करने से पापों का क्षय, पुण्य की प्राप्ति और भगवान विष्णु की कृपा मिलने की मान्यता है। श्रद्धालु इस दिन उपवास रखकर पूजा-पाठ, दान-पुण्य और भक्ति में समय व्यतीत करते हैं।
निर्जला एकादशी 2026
निर्जला एकादशी को सभी एकादशियों में सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। इस व्रत में श्रद्धालु बिना अन्न और जल ग्रहण किए उपवास रखते हैं। धार्मिक मान्यता है कि जो व्यक्ति वर्षभर की सभी एकादशियों का व्रत नहीं कर पाता, उसे केवल निर्जला एकादशी का व्रत करने से भी समान पुण्य फल प्राप्त हो सकता है।
- तिथि: 12 जून 2026 (शुक्रवार)
- आराध्य देव: भगवान विष्णु
- विशेषता: जल तक का त्याग कर व्रत रखा जाता है।
- दान का महत्व: जल, छाता, वस्त्र, फल और अन्न का दान शुभ माना जाता है।
परमा एकादशी 2026
परमा एकादशी अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) में आने वाली विशेष एकादशी मानी जाती है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा करने और व्रत रखने से मोक्ष की प्राप्ति तथा जीवन की बाधाओं से मुक्ति मिलने की मान्यता है।
- तिथि: परमा एकादशी केवल अधिक मास में आती है। वर्ष 2026 के सामान्य जून माह में परमा एकादशी नहीं पड़ती। यदि किसी पंचांग विशेष में इसका उल्लेख हो तो स्थानीय पंचांग के अनुसार तिथि की पुष्टि करना उचित रहेगा।
- महत्व: आध्यात्मिक उन्नति और पुण्य संचय के लिए विशेष।
एकादशी व्रत का धार्मिक महत्व
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, एकादशी का व्रत मन, वचन और कर्म की शुद्धि का प्रतीक है। इस दिन भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप, विष्णु सहस्रनाम का पाठ और दान-पुण्य करने से विशेष फल प्राप्त होता है। श्रद्धालु मानते हैं कि एकादशी व्रत से न केवल आध्यात्मिक लाभ मिलता है, बल्कि जीवन में सकारात्मकता और मानसिक शांति भी आती है।
पूजा-विधि
- प्रातः स्नान कर भगवान विष्णु की पूजा करें।
- पीले पुष्प, तुलसी दल और प्रसाद अर्पित करें।
- “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करें।
- विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।
- जरूरतमंदों को अन्न, जल और वस्त्र का दान करें।
- द्वादशी तिथि पर विधिपूर्वक व्रत का पारण करें।
प्रमुख लाभ
- भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होने की मान्यता।
- पापों का क्षय और पुण्य की प्राप्ति।
- मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति।
- परिवार में सुख-समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का संचार।