अन्नपूर्णा माता व्रत कथा: अन्न की अधिष्ठात्री देवी की कृपा का पावन प्रसंग
अन्नपूर्णा माता हिंदू धर्म में अन्न, समृद्धि और पोषण की देवी मानी जाती हैं। कहा जाता है कि जब भी संसार में अन्न का अभाव होता है, माता अन्नपूर्णा अपनी दिव्य कृपा से जीवन में भरपूरता का संचार करती हैं। अन्नपूर्णा व्रत कथा का प्रमुख भाव यही है कि अन्न का दान और सम्मान ईश्वर की सच्ची उपासना है।
व्रत कथा का मूल प्रसंग
एक समय ऐसा आया जब संसार में अन्न का संकट गहरा गया। लोग भूख से व्याकुल होने लगे और भगवान शिव स्वयं भी अन्न के अभाव से चिंतित हुए। इस पर माता पार्वती ने अन्नपूर्णा स्वरूप धारण कर वाराणसी के अन्नपूर्णा मंदिर में प्रकट होकर अन्न से भरा हुआ सोने का कलश और करछुल धारण किया। उनके दर्शन मात्र से अन्न की वर्षा होने लगी।
शिवजी उनके पास पहुंचे और मानवता के लिए अन्न की याचना की। माता ने मुस्कुराकर कहा—
“हे नाथ! जब तक संसार अन्न का सम्मान नहीं करेगा, तब तक समृद्धि स्थायी नहीं होगी।”
माता ने शिव को अपने हाथों से अन्न परोसा और तभी से यह विश्वास स्थापित हुआ कि संसार में अन्न की उपलब्धता माता अन्नपूर्णा की कृपा पर निर्भर करती है।
व्रत का महत्व और अनुष्ठान
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इस व्रत में माता की प्रतिमा या चित्र के सामने दीपक और धूप जलाकर पूजा की जाती है।
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गेहूं, चावल या किसी भी अन्न का दान इस दिन अत्यंत शुभ माना जाता है।
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भक्त कथा का श्रवण करके ‘अन्नपूर्णे सदापूर्णे’ स्तुति का पाठ करते हैं।
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व्रत रखने वाले दिन स्वच्छता, संयम और सात्त्विक भोजन का पालन किया जाता है।
अन्न केवल भोजन नहीं बल्कि जीवों की जीवनरेखा है। इसका सम्मान, संरक्षण और दान मानव का श्रेष्ठ धर्म है।
अन्नपूर्णा माता की कथा हमें सिखाती है कि समृद्धि तभी टिकती है जब हम सह-अस्तित्व, करुणा और दान की भावना के साथ जीवन जीते हैं।